वसीयत..
हुबहू चाहते थे,
वो जहानुमा निकले....
वहशियाना, वहमी चढ़ाए रहते थे,
बेसुद, बेहया तो हम निकले...
बेहिसाब वस्फ़ उनके किसे क्या बताये,
वस्ल की राहे रोशन, जन्नत बना बैठी है....
उनके अस्मत के वफादार है हम,
उनके होने से आलमगीर है हम....
ये वसीयत है उनके नाम,
जिनके नामसे,
ऐसे लाखो जहां निकले....
-मंदार १ मार्च २०१०
{ वसीयत- मृत्युपत्र ;
जहानुमा- सगळ जग ज्यात दिसत, असा पेला किंवा आरसा ;
वहशियाना - जंगली, असभ्य ;
वहमी - शंकेखोर ;
बेसुद - व्यर्थ ;
बेहया- निर्लज्ज ;
वस्फ़ - गुण ;
वस्ल - मिलन ;
अस्मत - सतीत्व ;
आलमगीर- जगाज्जेता }
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